मुन्नी मोबाइल (उपन्यास)…………..

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एक ग्लोकल उपन्यास जल्दी ही छपकर आयी है – मुन्नी मोबाइल।

ग्लोबल से लेकर लोकल मसलों का क्रियेटिव प्रस्तुतीकरण इसमें है। उपन्यास के लेखक हैं – प्रदीप सौरभ। करीब चौथाई शताब्दी से भी ज्यादा का पत्रकारिता – लेखन का तजुरबा रखने वाले प्रदीप सौरभ ने तमाम मसलों, प्रक्रियाओं को काफी गहराई से देखा है। रिपोर्टर की नजर, क्रियेटिव राइटर की कल्पनाशीलता ने उपन्यास को बेहद पठनीय बनाया है। अपने समय के लगभग सारे मसले इस उपन्यास में हैं। काल सेंटर और ग्लोबलाइजेशन, काल गर्ल और ग्लोबल रैकेट, और भी बहुत कुछ समेटे यह उपन्यास जल्दी ही आपके सामने छप कर आयी है, तब तक इस उपन्यास के एक खास अंश को पढ़ें-

साहिबाबाद दिल्ली की सीमा से जुड़ा एक गांव है। गांव नेशनल हाइवे पर है। सडक़ के दूसरी ओर बड़े अपार्टमेन्ट्स हैं। गांव के साथ इंडस्ट्रियल एरिया है। फैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूर साहिबाबाद गांव में सस्ते मकानों में रहते हैं। गांव में जाटों का वर्चस्व है। गूर्जर भी हैं। लेकिन गांव में बिहारियों ने सामाजिक समीकरण गड़बड़ा दिये हैं। जमीन के छोटे-छोटे टुकड़े खरीद कर उसमें उन्होंने अपना आशियाना बना लिया है। संख्या बल के हिसाब से जाटों से बिहारियों की संख्या ज्यादा हो गई है। पंचायत पर जाटों का कब्जा है।

प्रतीक चौधरी उर्फ टीटी पंचायत के मुखिया हैं। टीटी ने रेलवे में कभी काम नहीं किया। उसके दादा टीटियों की लखदक ड्रेस से काफी प्रभावित थे। वह प्रतीक को टीटी बनाना चाहते थे। वह तो हुआ नहीं। टीटी ने अपराध जगत में अपना नाम कमा लिया। टीटी अपने बाप का हत्यारा है। उसने अपने बाप को अपनी बहन के साथ छेड़खानी करते देखा था। बस इसी बात पर उसने अपने बाप की हत्या कर दी थी। टीटी के चाचा हेमराज भी अपने मां-बाप की हत्या कर चुके हैं।

गांव की जमीन गाजियाबाद विकास प्राधिकरण द्वारा एक्वायर होने के बाद मिले मुआवजे को न देने पर उसके चाचा ने दरांती से अपने मां-बाप की हत्या कर दी थी। टीटी के पंचायत का मुखिया बनने में भी उसकी अपराधी छवि ही काम आई। असल में टीटी से लेकर वीरेन्द्र, बबली, जितेन्द्र, सुनील कसाना तक साहिबाबाद के सभी रंगदार सुरेन्द्र बिहारी पहलवान के चेले हैं। आसपास के गांवों-झंडापुर, कडक़ड़ी, प्रहलाद गढ़ी, कनावनी, भकनपुर के रंगदार भी उसी के अखाड़ से निकले हैं। पहलवान बिहार से हर तरह के देशी कट्टे मंगा कर सप्लाई करता है। अंग्रेजी सामान का भी मांग पर वह इंतजाम कर देता है। कीमत उसकी मुंह मांगी होती है।

पहलवान का अखाड़ा दिल्ली-हाबड़ा रेलवे लाइन के साथ है। रेलवे की बेशकीमती जमीन पर पहलवान का कब्जा है। बड़े-बड़े बिल्डरों की नजर इस जमीन पर है। लेकिन पहलवान से पंगा लेने के लिए कोई तैयार नहीं है। उत्तर प्रदेश के एक मंत्री सोमपाल त्यागी के बेटे सिरीश की नजर इस जमीन पर है। टीटी और इलाके के दूसरे रंगदारों से मिलकर सिरीश पहलवान को उसकी जमीन से खदेड़ देता है। मंत्री का बेटा है, इसलिए पुलिस भी जमीन खाली कराने में सिरीश की खुल कर मदद करती है।

चेलों की बेवफाई से पहलवान काफी दुखी है। उम्र होने के चलते उसका भौकाल भी कम हो गया है। अब जमीन पर सिरीश प्लाट काट कर धड़ाधड़ बेच रहा है। और यह सब उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बहन मायावती सरकार की नाक के नीचे हो रहा है। बहनजी कहती थकती नहीं हैं कि उन्होंने उत्तर प्रदेश में हर तरह के माफियाओं को उनकी औकात जता दी है। उनके मंत्रिमंडल में बैठे लोगों के बारे में उनकी क्या राय है, यह तो वही जानती होंगी।

साहिबाबाद गांव के युवाओं में अपराध ने पेशे का रूप ले रखा है। टीटी सबके प्रेरणास्रोत हैं। गूर्जर टीटी को नहीं पसंद करते। इसीलिए अहम की लड़ाई में गांव में लाठी-गोली चलती रहती है। पुलिस का भी गांव में आना-जाना खूब है। जाट दारू पीकर बिहारियों पर गाहे-बगाहे अपनी मर्दानगी दिखाते रहते हैं। दिल्ली की नाक के नीचे बसे इस गांव में गांव जैसा कुछ भी नहीं रह गया है। झगड़े के लिए यहां कोई खास वजह की जरूरत नहीं होती। कौवा कान ले गया। कान को देखे बिना ही जंग छिड़ सकती है।

मुन्नी का गांव भी साहिबाबाद है। बिहार के बक्सर से जब वह साहिबाबाद गांव में आई थी तो शुरुआत में वह झुग्गी-झोंपड़ी में रही। वह जब यहां आई थी तो उसकी गोद में एक बेटी थी। उसकी उम्र उस वक्त सतरह साल की होगी। पति को शराब बनाने वाली फैक्ट्री मोहन मेकिन में अपने पिता मुखा सिंह यादव की जगह एक छोटी सी नौकरी मिल गई थी। धीरे धीरे उसने यहां जमीन खरीद कर पक्का मकान बना लिया। मुन्नी के पति नंदलाल को हिन्दी अच्छी तरह से नहीं आती। पूरा भोजपुरिया मानुष है। बक्सर में होने वाले मेलों में रंडी का नाच देखने जाना नहीं भूलता है। खुद भी बिहार का लौंडा डांस करने में माहिर है।

होली-दीवाली के मौके पर दारू पीकर बिहारियों को इकठ्टा कर रात भर डांस करता है। दारू तीज त्योहार में ही पीता है। वैसे शरीफ है। कम बोलता है। लड़ाई-झगड़ा उसकी प्रकृति में नहीं है। झगड़े-लड़ाई के मौेके पर मुन्नी ही मोर्चा संभालती है। झुग्गी छोडऩे के वक्त जब मुन्नी गांव के एक मकान में किराये पर आई तो उसके मालिक हीर सिंह गुर्जर से उसकी ठीक-ठाक थी, लेकिन जब उसने हीर सिंह के सामने वाली जमीन में अपना मकान बना लिया तो हीर सिंह को यह बात हजम नहीं हुई।

उसने अंदर-अंदर मुन्नी से खुन्नस पाल ली। गाहे-बगाहे वह छोटी-छोटी बात को लेकर मुन्नी से लडऩे लगा। एक दिन मुन्नी की बेटी को हीर सिंह ने रात में पीट दिया। मुन्नी तिलमिला गई। दुर्गा और काली की शक्ति लिये उसने आव देखा न ताव, भिड़ गई हीर सिंह से।.. दौड़ा लिया हीर सिंह को। दौड़ती हुई नाके तक गई। पुलिस कंट्रोल रूम की जिप्सी नाके पर ही खड़ी होती है। पुलिस को देखते ही हीर सिंह घबरा गया। मुन्नी का हौसला बढ़ा। हौसला क्यों न बढ़ता! वह पत्रकारों के घरों में काम जो करती थी। पत्रकारों के पुलिस संबंधों को वह जानती थी। कई बड़े पुलिस अफसरों को उसने आनंद भारती के घर पर हाथ जोड़े देखा था। उसे पता था कि पुलिस उसका कुछ नहीं बिगाड़ पायेगी। मामला अगर गड़बड़ायेगा तो साहब हैं ही।

पुलिस इंस्पेक्टर ने हीर सिंह को घर में घुस कर पकड़ लिया। साथ में मोहल्ले वालों के सामने ही दो-चार कंटाप भी रसीद कर दिये। मुन्नी उत्साहित हो गई। हीर सिंह के सामने आकर उसने बोला- ‘मेरा नाम मुन्नी मोबाइल है। इस बात को कभी न भूलना। बस, उसके बाद मुन्नी साहिबाबाद में मुन्नी मोबाइल के नाम से जानी जाने लगी।

Pravin singh

pravinsingh203@gmail.com

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